Tuesday, May 12, 2009

हाल-ऐ-दिल उन दिनों की

वोह उनतीस की दोपहर,
बैठे बस घंटा चार भर।
वक़त इतना तो काफी था की दोस्ती को दिल 'हाँ' कहें
निगाहों ने इसकी भी मंजूरी दे दी थी .
पर इसका तो ख़ुद ही से हैं शिकवा
एक वो बात जो मैं कह सका ही नही
मुझमे हैं वो बात जो कभी रहा ही नही ।
अब तो बॉस येही क्वाहीस्श हैं कि
जब भी हो मुलाकात, कह सकूं में दिल की बात

“हमे आपसे इश्क है”-
इन तीन सब्दो को कहने के लिए तरस गए
ऐ हुस्न, तेरे ही दीदार को तरस गए
वो भोली सी सूरत; वो नरम आवाज़
वो नश्हिली पल्खें और मुह्हज्ज़ब लहजे
याद आते ही , रौंगटे खड़े हो जाते हैं
अपना तो ये आलम है की न सो सकते है
और न रो सकते है, बस याद में आपके तड़पते रहते है .

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