वोह उनतीस की दोपहर,
बैठे बस घंटा चार भर।
वक़त इतना तो काफी था की दोस्ती को दिल 'हाँ' कहें
निगाहों ने इसकी भी मंजूरी दे दी थी .
पर इसका तो ख़ुद ही से हैं शिकवा
एक वो बात जो मैं कह सका ही नही
मुझमे हैं वो बात जो कभी रहा ही नही ।
अब तो बॉस येही क्वाहीस्श हैं कि
जब भी हो मुलाकात, कह सकूं में दिल की बात
“हमे आपसे इश्क है”-
इन तीन सब्दो को कहने के लिए तरस गए
ऐ हुस्न, तेरे ही दीदार को तरस गए
वो भोली सी सूरत; वो नरम आवाज़
वो नश्हिली पल्खें और मुह्हज्ज़ब लहजे
याद आते ही , रौंगटे खड़े हो जाते हैं
अपना तो ये आलम है की न सो सकते है
और न रो सकते है, बस याद में आपके तड़पते रहते है .
Tuesday, May 12, 2009
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